जानिए भगवान विष्णु कैसे है अनाथो के जगन्नाथ ! Hindi Story

श्यामलदास द्वारका से दस कोस की दूरी पर स्थित एक गाँव में रहते थे। वे केवल दस वर्ष के थे, जब उनके माता – पिता स्वर्ग सिधार गए थे। अपने पूर्वजन्म के पुण्य संस्कारों के कारण उन्हें ईश्वर में पूर्ण विश्वास था। 

प्रारम्भ 

एक बार अपने गाँव में आयोजित सत्संग में वे भी बैठे थे। सत्संग में संत महाराज कह रहे थे कि भगवान अनाथों के नाथ हैं; क्योंकि वे जगत के नाथ हैं अर्थात जगन्नाथ हैं। वे परम दयालु हैं। जो कोई भी निश्छल हृदय से उन्हें पुकारता है, वे उसकी अवश्य सुनते हैं। भगवान अनाथों के नाथ हैं – यह सुनकर श्यामलदास की आँखों में आँसू भर आए, क्योंकि माता – पिता के न होने के कारण वे सदा सोचते हैं कि मैं कितना अभाग हूँ कि मेरे माता – पिता मुझे बचपन में ही छोड़कर चले गए। मैं भी तो अनाथ ही हूँ। यह जीवन में मेरा कोई आसरा नहीं है, नहीं। तब क्या भगवान मुझ जैसे अनाथ के नाथ बनेंगे ? क्या वे कभी मेरी सुधि ले जाते हैं। अक्सर उनके मन में इस तरह के विचार आते रहते थे। पर उस दिन संत महाराज के मुख से यह सुनकर कि भगवान अनाथों के नाथ हैं, उनका ईश्वर के प्रति विश्वास और भी विश्वास हो गया है।

प्रथम चरण 

संत महाराज से मंत्र – दीक्षा लेकर श्यामलदास नित्य भगवान की पूजा – उपासना करने लगे। गले में तुलसी की कंठीमाला धारण कर वे नित्य भग नमो भगवते वासुदेवाय ‘मंत्र का जप करने लगे। वे प्रत्येक एकादशी को व्रत उपवास करते हैं, विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करते हैं। 

उनकी ईश्वरभक्ति कोई प्रवृत्ति, दिखावा या चिह्न – पूजा व कर्मकांडीय आडंबर भर नहीं थी। वे अपने गुरु के कहे अनुसार भगवान की प्रतिमा की पूजा के साथ साथ इस अखिल विश्व – ब्रह्मांड को साक्षात् ईश्वर का रूप मानकर समाज की सेवा भी करने लगे। वे अपने खेत में फसल उगाते और अपने उपयोग के बाद जो भी अन्न बच जाता है, उसे अपने गाँव के जरूरतमंद उनका ईश्वर के प्रति विश्वास और भी दृढ़ हो गया। संत महाराज से मंत्र – दीक्षा लेकर श्यामलदास नित्य भगवान की पूजा – उपासना करने लगे। 

गले में तुलसी की कंठीमाला धारण कर वे नित्य भग नमो भगवते वासुदेवाय ‘मंत्र का जप करने लगे। वे प्रत्येक एकादशी को व्रत उपवास करते हैं, विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करते हैं। उनकी ईश्वरभक्ति कोई प्रवृत्ति, दिखावा या चिह्न – पूजा व कर्मकांडीय आडंबर भर नहीं थी।

दूसरा चरण 

वे अपने गुरु के कहे अनुसार भगवान की प्रतिमा की पूजा के साथ साथ इस अखिल विश्व – ब्रह्मांड को साक्षात् ईश्वर का रूप मानकर समाज की सेवा भी करने लगे। वे अपने खेत में फसल उगाते और अपने उपयोग के बाद जो भी अन्न बच जाता है, उसे अपने गाँव के जरूरतमंद उनका ईश्वर के प्रति विश्वास और भी दृढ़ हो गया। 

संत महाराज से मंत्र – दीक्षा लेकर श्यामलदास नित्य भगवान की पूजा – उपासना करने लगे। गले में तुलसी की कंठीमाला धारण कर वे नित्य भग नमो भगवते वासुदेवाय ‘मंत्र का जप करने लगे। वे प्रत्येक एकादशी को व्रत उपवास करते हैं, विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करते हैं। उनकी ईश्वरभक्ति कोई प्रवृत्ति, दिखावा या चिह्न – पूजा व कर्मकांडीय आडंबर भर नहीं थी। वे अपने गुरु के कहे अनुसार भगवान की प्रतिमा की पूजा के साथ साथ इस अखिल विश्व – ब्रह्मांड को साक्षात् ईश्वर का रूप मानकर समाज की सेवा भी करने लगे। वे अपने खेत में फसल उगाते और अपने उपयोग के बाद जो भी अन्न बच जाता है, उसे अपने गाँव के जरूरतमंद विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करते हैं।

उनकी ईश्वरभक्ति कोई प्रवृत्ति, दिखावा या चिह्न – पूजा व कर्मकांडीय आडंबर भर नहीं थी। वे अपने गुरु के कहे अनुसार भगवान की प्रतिमा की पूजा के साथ साथ इस अखिल विश्व – ब्रह्मांड को साक्षात् ईश्वर का रूप मानकर समाज की सेवा भी करने लगे। वे अपने खेत में फसल उगाते और अपने उपयोग के बाद जो भी अन्न बच जाता है, उसे अपने गाँव के जरूरतमंद विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करते हैं। उनकी ईश्वरभक्ति कोई प्रवृत्ति, दिखावा या चिह्न – पूजा व कर्मकांडीय आडंबर भर नहीं थी।

उनकी ईश्वरभक्ति कोई प्रवृत्ति, दिखावा या चिह्न – पूजा व कर्मकांडीय आडंबर भर नहीं थी। वे अपने गुरु के कहे अनुसार भगवान की प्रतिमा की पूजा के साथ साथ इस अखिल विश्व – ब्रह्मांड को साक्षात् ईश्वर का रूप मानकर समाज की सेवा भी करने लगे। वे अपने खेत में फसल उगाते और अपने उपयोग के बाद जो भी अन्न बच जाता है, उसे अपने गाँव के जरूरतमंद लोगों में बाँट दिया करते हैं। 

वे गाँव के सभी लोगों को सदा ही भगव दृष्टि से देखते हैं और उनकी सेवा को भी भगवान वासुदेव की ही सेवा – पूजा मानते हैं। गाँव की स्वच्छ- -सफाई हो, वृक्षारोपण करना हो, पैचब की सफाई करवानी हो, किसी के विवाह की तैयारी में सेवा – सहयोग करना हो, बीमार लोगों की सेवा – सहायता करनी हो तो वे इन सभी कार्यों में हमेशा बढ़ – चढ़कर हिस्सा लेते हैं थे।

इन सभी सेवाकार्यों को करते हुए उन्हें ऐसा लगता था मानो वे इन कार्यों से भी भगवान वासुदेव की ही पूजा कर रहे होंगे। वे सोचते थे कि ये सभी सेवाकार्य भगवान वसुदेव के ही हैं। अत: मैं जो भी कर रहा हूँ,

भगवान वसुदेव के लिए ही कर रहा हूँ। उनकी सेवाकार्य से गाँव के लोगों को भी सेवाकार्य करने की प्रेरणा मिलने लगी और सच कहें तो वह ईश्वरभक्ति भी क्या, जो हमारे व्यवहार में दिखाई न दे, जो हमारे कर्म में दिखाई न दे। हमारा ऐसा धार्मिक – आध्यात्मिक होना भी क्या जो हमारे जीवन में, चिंतन में, व्यवहार में दिखाई न दे। सच यह भी है कि चिंतन, चरित्र और व्यवहार में भक्ति केवल दिखाई पड़ती है, 

तीसरा चरण 

जब भक्ति मात्र आडम्बर या कर्मकांडीय प्रवंचना मात्र न होकर भक्त के हृदय में भगवान को प्रत्यक्ष अनुभव करने की प्यास और पुकार बनती उतरती है। श्यामलदास की भक्ति में भी ईश्वर को पाने की, उन्हें अपने हृदय में अनुभव करने की सच्ची प्यास व तप थी। इसलिए जब वे ब्राह्ममुहूर्त में अपने आराध्य का नाम स्मरण करते हैं, मंत्रजप करते हैं तो उनके द्वारा किया गया मंत्रजप कुछ शब्दों का उच्चारण केवल बनकर नहीं रहता था। बल्कि मन्जप करते हैं वे उस मंत्र के तत्त्वदर्शन में समाहित हो जाते थे। 

इससे उस मंत्र का एक – एक शब्द जुड़कर भगवान वासुदेव के दिव्यरूप में संशोधित हो जाता है जिससे श्यामलदास मंत्रजप करते हुए भगवान वासुदेव के दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हैं – करते उसमें डूब जाते हैं और अपनी उत्तेजना ज्ञान खोते हैं ।ध्यान में भगवान वासुदेव के दिव्य स्वरूप का दर्शन करते हैं। करते ही उनका रोम – रोम पुलकित होने लगता है।

वे जब भगवान की स्तुति करते हैं तो स्तुति में भगवान के दिव्य स्वरूप में खो जाते हैं, भगवान के दिव्य गुणों का बार – बार चिंतन – स्मरण करते हैं। वे जब भगवान की प्रतिमा की पूजा करते हैं तो उन्हें ऐसा महसूस होता है मानो विश्वरूप भगवान स्वयं प्रतिमा के रूप में प्रकट हुए हों। 

वे उनके द्वारा अर्पित भोग – सामग्री को वास्तव में ग्रहण कर रहे हैं। कोई भी कार्य करते हुए उन्हें ऐसा लगता है कि सर्वनाम, सर्वव्यापी भगवान हर जगह उपस्थित हैं और वे मेरे द्वारा किए जा रहे कर्मों को अपनी आँखों से देख रहे हैं। 

ऐसी भावना रखने के कारण उन्हें भूले से भी कोई भूल नहीं होती थी। उन्हें लगता है कि कोई बुरा कर्म कर लेने के बाद भला भगवान के पास बैठकर मैं उन्हें अपनी आँखें कैसे पाऊँगा? इसलिए वे अपने छोटे – बड़े हर कार्य के प्रति बड़े सावधान और सतर्क रहते थे। 

इस तरह श्यामलदास जीवनभर भगवान की सच्ची उपासना व सेवा करते रहे। इससे उनका मन पूर्ण रूप से पवित्र हो गया। अब तो वे जहाँ कहीं भी बैठकर भगवान का ध्यान करते हैं तब वे तुरंत ही ध्यान में उतर जाते हैं। इसी मनोदशा व भावदशा में एक दिन वे जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान का दर्शन करने द्वारका पहुँचे। कोसों की लंबी पदयात्रा व उपवास के कारण वे काफी थक चुके थे।

ब्राह्ममुहूर्त में भगवान द्वारकाधीश का दर्शन कर वे रोमांचित हो उठे। दिनभर वे उसी भावदशा में डूबे रहे, खाने – पीने की कोई सुधि न रही। मंदिर से बाहर निकलकर समुद्र के किनारे एक शिला पर लेटते ही वे गहरी नींद में चले गए। नींद में उन्होंने एक दिव्य स्वप्न देखा। उन्होंने देखा कि भगवान वासुदेव अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर उन्हें दर्शन दे रहे हैं और कह रहे हैं- “श श्यामल! 

मैं तुम्हारी सच्ची सेवाभक्ति से प्रसन्न हूँ। बोलो तुम्हें क्या चाहिए वत्स।” भगवान की दिव्य वाणी सुनकर उनका रोम – रोम पुलकित। हो जाओ। वे फुत – फूटकर रोने लगे, भगवान के चरण पकड़कर बिलख – बिलखकर रोने लगे और बोले- “भगवन्! आप मुझ अनाथ के नाथ बन जाइए। 

मैं आपको कभी भूलूँ नहीं, ऐसी कृपा आपकी।” भगवान और ऋतु कहते हुए अंतर्धान हो गए। सुबह ब्राह्ममुहूर्त में जकर पुनः भगवान द्वारकाधीश के दर्शन कर वे गाँव के लिए प्रस्थान कर गए।

वे अपने खेत में फसल उगाते और अपने उपयोग के बाद जो भी अन्न बच जाता है, उसे अपने गाँव के जरूरतमंद  लोगों में बाँट दिया करते । वे गाँव के सभी लोगों को सदा ही भगवदृष्टि से देखते और उनकी सेवा को भी भगवान वासुदेव की ही सेवा – पूजा मानते । गाँव की साफ- -सफाई हो , वृक्षारोपण करना हो , तालाब की सफाई करवानी हो , किसी के विवाह की तैयारी में सेवा – सहयोग करना हो , बीमार लोगों की सेवा – सहायता करनी हो तो वे इन सभी कार्यों में हमेशा बढ़ – चढ़कर हिस्सा लेते थे । 

इन सभी सेवाकार्यों को करते हुए उन्हें ऐसा लगता था मानो वे इन कार्यों से भी भगवान वासुदेव की ही पूजा कर रहे हों । वे सोचते थे कि ये सभी सेवाकार्य भगवान वासुदेव के ही तो हैं । 

अत : मैं जो भी कर रहा हूँ , भगवान वासुदेव के लिए ही कर रहा हूँ । उनके सेवाकार्य से गाँव के लोगों को भी सेवाकार्य करने की प्रेरणा मिलने लगी और सच कहें तो वह ईश्वरभक्ति भी क्या , जो हमारे व्यवहार में दिखाई न दे , जो हमारे कर्म में दिखाई न दे । हमारा ऐसा धार्मिक – आध्यात्मिक होना भी क्या जो हमारे जीवन में , चिंतन में , व्यवहार में दिखाई न दे । सच यह भी है कि चिंतन , चरित्र और व्यवहार में भक्ति तभी दिखाई पड़ती है , जब भक्ति मात्र आडंबर या कर्मकांडीय प्रवंचना मात्र न होकर भक्त के हृदय में भगवान को प्रत्यक्ष अनुभव करने की प्यास और पुकार बनकर उतरती है । 

श्यामलदास की भक्ति में भी ईश्वर को पाने की , उन्हें अपने हृदय में अनुभव करने की सच्ची प्यास व तड़प थी । इसलिए जब वे ब्राह्ममुहूर्त में अपने आराध्य का नाम स्मरण करते , मंत्रजप करते तो उनके द्वारा किया गया मंत्रजप कुछ शब्दों का उच्चारण मात्र बनकर नहीं रहता था , बल्कि मंत्रजप करते वे उस मंत्र के तत्त्वदर्शन में समाहित हो जाया करते थे । 

इससे उस मंत्र का एक – एक शब्द जुड़कर भगवान वासुदेव के दिव्यस्वरूप में परिवर्तित हो जाता जिससे श्यामलदास मंत्रजप करते हुए भगवान वासुदेव के दिव्य स्वरूप का ध्यान करते – करते उसमें डूब जाते और अपना बाह्यज्ञान खो बैठते ।ध्यान में भगवान वासुदेव के दिव्य स्वरूप का दर्शन करते ही उनका रोम – रोम पुलकित होने लगता । वे जब भगवान की स्तुति करते तो स्तुति में वर्णित भगवान के दिव्य स्वरूप में खो जाते , भगवान के दिव्य गुणों का बार – बार चिंतन – स्मरण करते । 

वे जब भगवान की प्रतिमा की पूजा करते तो उन्हें ऐसा महसूस होता मानो विश्वरूप भगवान स्वयं प्रतिमा के रूप में प्रकट हुए हों । वे उनके द्वारा अर्पित भोग – सामग्री को सचमुच ग्रहण कर रहे हों । कोई भी कार्य करते हुए उन्हें ऐसा लगता कि सर्वज्ञ , सर्वव्यापी भगवान हर जगह उपस्थित हैं और वे मेरे द्वारा किए जा रहे कर्मों को अपनी आँखों से देख रहे हैं । ऐसी भावना रखने के कारण उनसे भूले से भी कोई भूल नहीं होती थी । 

उन्हें लगता कि कोई बुरा कर्म कर लेने के बाद भला भगवान के पास बैठकर मैं उनसे अपनी आँखें कैसे मिला पाऊँगा ? इसलिए वे अपने छोटे – बड़े हर कार्य के प्रति बड़े सावधान व सतर्क रहा करते थे । 

इस तरह श्यामलदास जीवनभर भगवान की सच्ची उपासना व सेवा करते रहे । इससे उनका मन पूर्णतः पवित्र हो गया । अब तो वे जहाँ कहीं भी बैठकर भगवान का ध्यान करते तब वे तुरंत ही ध्यान में गहरे उतर जाते । इसी मनोदशा व भावदशा में एक दिन वे जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान का दर्शन करने द्वारका पहुँचे । कोसों की लंबी पदयात्रा व उपवास के कारण वे काफी थक चुके थे । 

अंतिम चरण 

ब्राह्ममुहूर्त में भगवान द्वारकाधीश का दर्शन कर वे रोमांचित हो उठे । दिनभर वे उसी भावदशा में डूबे रहे , खाने – पीने की कोई सुधि न रही । मंदिर से बाहर निकलकर समुद्र के किनारे एक शिला पर लेटते ही वे गहरी निद्रा में चले गए । निद्रा में उन्होंने एक दिव्य स्वप्न देखा । उन्होंने देखा कि भगवान वासुदेव अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर उन्हें दर्शन दे रहे हैं और कह रहे हैं- ” पुत्र श्यामल ! मैं तुम्हारी सच्ची सेवाभक्ति से प्रसन्न हूँ । बोलो तुम्हें क्या चाहिए वत्स । ” भगवान की दिव्य वाणी सुनकर उनका रोम – रोम पुलकित हो उठा ।

वे फूट – फूटकर रोने लगे , भगवान के चरण पकड़कर बिलख – बिलखकर रोने लगे और बोले- ” भगवन् ! आप मुझ अनाथ के नाथ बन जाइए । मैं आपको कभी भूलूँ नहीं , ऐसी कृपा कीजिए । ” भगवान तथास्तु कहते हुए अंतर्धान हो गए । सुबह ब्राह्ममुहूर्त में जागकर पुनः भगवान द्वारकाधीश के दर्शन कर वे गाँव के लिए प्रस्थान कर गए । रास्ते भर स्वप्न में दिखे भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप का ध्यान करते – करते वे आनंदित होते रहे और तब से आजीवन उसी भावदशा में रहे । सचमुच अनाथों के नाथ हैं भगवान जगन्नाथ ।

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